2019 में अहोई अष्टमी कब है? जानें महत्व, कथा और पूजा विधि


अहोई अष्टमी का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। यह पर्व करवा चौथ के चार दिन बाद तथा दीवाली के आठ दिन पहले मनाया जाता है। अहोई माता का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तथा अपनी संतान के कल्याण के लिए इस व्रत को किया जाता है। प्राचीन काल में यह व्रत केवल पुत्र संतान के लिए ही किया जाता है परन्तु आजकल यह कन्या संतान के लिए भी किया जाता है। अहोई माता मेरे पुत्रों को दीर्घायु, स्वस्थ्य तथा सुखी रखें, अनहोनी से बचाने वाली माता देवी पार्वती है इसलिए इस व्रत में माता पार्वती की पूजा की जाती है।   

Ahoi Ashtami 2019

अहोई अष्टमी 2019

21 अक्टूबर 2019- सोमवार

पूजा का समय – 19:38 से 20:43 मिनिट तक 

तारों के दिखने का समय- सायं 20:10 बजे

चंद्रोदय रात्रि- 02:41 मिनिट (22 अक्टूबर 2019)

अष्टमी तिथि प्रारम्भ -21 अक्टूबर 2019 को दोपहर 2 बजकर 14 मिनिट से

अष्टमी तिथि समाप्त- 22 अक्टूबर 2019 को दोपहर 12: 55 तक

 अहोई अष्टमी का महत्व

अहोई अष्टमी  व्रत की उत्तर भारत में बहुत मान्यता है। माताएं अपने पुत्रों की ख़ुशी एवं कल्याणकारी जीवन की कामना करते हुए इस व्रत को करती है। माताएं बहुत ही उत्साह के साथ इस व्रत को करती है। अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और मंगलमय जीवन के लिए माता अहोई से प्रार्थना करती है। तारों तथा चंद्रमा के दर्शन तथा विधिवत पूजा करने के बाद ही व्रत खोलती है।

अहोई अष्टमी  का व्रत उन दंपत्ति के लिए भी फलदायी होता है, जिनकी कोई संतान नहीं होती या जिसकी संतान गर्भ में ही खत्म हो जाती है या बार-बार गर्भपात की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ऐसी महिलायें अगर पुत्र प्राप्ति की कामना करती है तो उन्हें पूरी श्रद्धा के साथ अहोई माता का व्रत करना चाहिएअहोई माता के आशीर्वाद से उनकी सुनी गोद जरुर भर जाती है इसी कारण से इस दिन को कृष्णा अष्टमी के नाम से भी लोग जानते है। कई सैलून से मधुरा के राधा कुंड में अहोई अष्टमी के दिन बड़ी संख्या में पुत्र प्राप्ति की आस लिए हुए दंपत्ति आते है तथा इस पावन कुंड में स्नान करते है।    

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अहोई अष्टमी व्रत कथा

इस पर्व को मनाने के पीछे एक कथा प्रचलित है कहते है एक साहूकार के सात पुत्र और एक पुत्री थी साहूकार के बेटों की शादी हो चुकी थी और बेटी भी विवाहित थी साहूकार की बेटी दिवाली पर अपने ससुराल से मायके आई थी। दिवाली पर घर की साफ-सफाई कर घर को लीपना था, इसलिए सारी बहुएं जंगल से मिट्टी लेने गई, यह देखकर ससुराल से मायके आई साहूकार की बेटी भी उनके साथ चल पडी  

साहूकार की बेटी जब मिट्टी खोद रही थी, उस जगह पर स्याहु अपने बच्चों के साथ रहती थी, मिट्टी खोदते समय गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहु का एक बच्चा मर गया इस पर क्रोधित होकर स्याह ने कहा की मै तेरी कोख बांधूंगी 

स्याहु के वचन सुनकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभियों से एक एक कर विनती करती है कि वह उसके बदले अपनी कोख बंधवा ले, इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते है, वह सात दिन बाद ही मर जाते है, सात पुत्रों की इस प्रकार मृत्यु होने के बाद उसने पंडित को बुलवाकर इसका कारण पूछापंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी।

सुरही सेवा से प्रसन्न होती है और छोटी बहू से पूछती है की तू किस लिए मेरी इतनी सेवा कर रही है और वह उससे क्या चाहती है? जो कोई भी तेरी इच्छा हो, वह मुझसे मांग लें। साहूकार की बहु ने कहा कि स्याह माता ने मेरी कोख बाँध दी है, जिससे मेरे बच्चे नहीं बचते है, यदि आप मेरी कोख खुलवा दे तो मै आपका उपकार मानूँगी। गाय माता ने उसकी बात मान ली और उसे साथ लेकर सात समुद्र पार स्याहु माता के पास ले चली।   

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रास्ते में थक जाने पर दोनों आराम करने लगते है। अचानक साहूकार की छोटी बहू की नजर एक ओर जाती है और वह देखती है की एक सांप पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा है और वह सांप को मार देती है। इतने में गरूड पंखनी वहां आ जाती है और खून बिखरा हुआ देखकर उसे लगता है की छोटी बहू ने उसके बच्चे को मार दिया है इस पर वह छोटी बहू को चोंच मारना शुरू कर देती है इस पर छोटी बहू कहती है कि उसने तो उसके बच्चे की जान बचाई है और गरूड पंखनी इस पर खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है। छोटी बहू स्याहु की भी सेवा करती है और स्याह छोटी बहू की सेवा से प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहू होने का आशीर्वाद देती है, स्याहु छोटी बहू को सात पुत्र और सात पुत्र वधुओं का आशीर्वाद देती है और कहती है की घर जाने पर तू अहोई माता का उद्यापन करना। सात-सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देना, उसने घर लौट कर देखा तो उसके सात बेटे और बहुएं मिली वह खुशी के मारे रोने लगी। उसने सात अहोई बनाकर सात कड़ाही देकर उद्यापन किया। उसके बाद से ही अपने संतान के सुख और कल्याण के लिए अहोई माता का व्रत करने की परम्परा है।

पूजा विधि

व्रत के दिन प्रात: जल्दी उठकर स्नान आदि के पश्चात पूजा का संकल्प लिया जाता है की हे अहोई माता में अपने पुत्र की लम्बी आयु एवं सुखी जीवन के लिए अहोई व्रत कर रही हूँ। अहोई माता मेरे पुत्रों को दीर्घायु, स्वस्थ्य एवं सुखी रखे। अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाया जाता है और साथ ही स्याह और उसके सात पुत्रों का चित्र भी निर्मित किया जाता है। माता के सामने चावल की कटोरी, मुली, सिंघाड़े रखते हुए सुबह दिया रखकर कहानी कही जाती है। कहानी सुनते समय जो चावल हाथ में लिए जाते है, उन्हें साड़ी/सूट के दुपट्टे में बाँध लेते है और सुबह पूजा करते समय लोटे में पानी और उसके ऊपर सिंघाड़े रखते है। सायंकाल को अहोई के चित्रों की पूजा की जाती है और पके हुए खाने में चौदह पूरी और आठ पूयों का भोग अहोई माता को लगाया जाता है, उस दिन बयाना निकाला जाता है। बायने में चौदह पूरी या मठरी या काजू होते है।
लोटे का पानी शाम को चावल के साथ तारों को अर्ध्य किया जाता है।

अहोई पूजा में एक अन्य विधान यह भी है कि चांदी की अहोई बनाई जाती है, जिसे स्याहु कहते है। इस स्याहु की पूजा रोली, अक्षत, दूध, व भात से की जाती है। पूजा चाहे आप जिस विधि से करें लेकिन दोनों में ही पूजा के लिए एक कलश में जल भर कर रख लें। पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुनें और सुनाएँ। पूजा के पश्चात अपनी अपनी सास के पैर छुएँ और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इसके पश्चात व्रती अन्न जल ग्रहण करती है।  

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